Wednesday, 25 October 2017

गरीबी एक व्यहम है

बून्द बून्द से घड़ा भरने की कोशिश कर रहा था,
पर दाने दाने ने पैसो का मोहताज बना डाला।।

सोचा था घर बना कर बैठुंगा सुकून से,
पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला।।

लोग कहते है,
अमीर और अमीर, गरीब और गरीब बनते जा रहा है,

जब घर में आकर परिवार के साथ दो रोटी सकूँ से खाया,
तब समझ आया अमीर और गरीब , गरीब और आमीर बनते जा रहा है।।

ये बात तब समझ आयी जब पैसे कमाने के लिए बहार निकल आया,
पैसे कमाते कमाते परिवार को कही दूर छोड़ आया।।

फिर ये एहसास भी हुआ,
सबसे बड़ा अमीर तो वो है जिसके पास हँसता खेलता परिवार है,
ना की वो जिसने परिवार से अलग हो कर कमाये मोटर गाड़ी कार है।।

हँसते हँसते एक गरीब आज बोल पड़ा
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी  कितना अजीब है,
शामें कटती नहीं,  और साल गुज़रते चले जा रहे  हैं।।

फिर से आमिर और अमीर, गरीब और गरीब बनते जा रहे है।।
(यहाँ अमीर की परिभाषा गरीब ने बदल दी है, 
समझ में आयी हो कविता तो comment के जरिये जरूर बताये)

आशुतोष ज. दुबे

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